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भारत-प्रशांत द्वीप समूह के देशों के मंच के दूसरे शिखर सम्मेलन

भारत-प्रशांत द्वीप समूह के देशों के मंच के दूसरे शिखर सम्मेलन

मैं आप सभी का भारत में हार्दिक स्वागत करता हूं। राष्ट्रपति भवन में आपकी अगवानी करना मेरे लिये सचमुच बेहद प्रसन्नता और सौभाग्य की बात है। भारत महासागरों और महाद्वीपों के जरिये प्रशांत द्वीप समूह देशों से अलग है, लेकिन इसके बावजूद उसे इन देशों के साथ करीबी मैत्री की दीर्घकालिक परम्परा पर गर्व है। हमारे लोग सदियों पुराने कारोबारी और सांस्कृतिक संबंधों से बधें हैं, जिन्होंने हमारे संबंधों में विश्वास और सौहार्द में योगदान दिया है। जिस तरह आप देशों ने भारतवंशियों को दूरदराज की भूमि में सहज और सुरक्षित महसूस कराया है, हम उसकी विशेष रूप से सराहना करते हैं। हमारी सरकार प्रशांत द्वीप समूह के देशों के हमारे मित्रों के साथ संबंधों को बहुत महत्व देती है। हमारा मानना है कि प्रशांत द्वीप समूह के देशों के साथ आर्थिक संपर्क और सहयोग विस्तारित ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के प्रमुख घटक हैं।

महामहिम,

भारत-प्रशांत द्वीप समूह के देशों के मंच के दूसरे शिखर सम्मेलन (एफआईपीआईसी) की मेजबानी करते हुए भारत को बहुत प्रसन्नता हो रही है। उन्होंने कहा कि इस मंच की स्थापना से हमारे देशों और जनता के बीच स्थायी भागीदारी कायम करने की सभी सदस्य देशों की इच्छा को परिलक्षित होती है। इसकी कामयाबी में आपकी सरकारों के योगदान के लिये मैं आपका आभार व्यक्त करना चाहता हूं। पिछले साल नवम्‍बर में फिजी में पहले एफआईपीआईसी शिखर सम्‍मेलन, के बाद साल भर से भी कम समय में नई दिल्ली और जयपुर में हमारा फिर से मिलना इस मंच के साझा उद्देश्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

मुझे इस बात का संज्ञान लेते हुए खुशी हो रही है कि कुछ महीने पहले फिजी में प्रथम एफआईपीआईसी शिखर सम्‍मेलन शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषित कार्यक्रमों के परिणाम सामने आने लगे हैं। हम अपने हित वाले क्षेत्रों – मसलन मानव संसाधन विकास, क्षमता निर्माण, स्वास्थ्य की देखरेख, किफायती, स्वच्छ एवं नवीकर्णीय ऊर्जा, आपदा प्रबंधन के लिये अनुकूलन उपाय और ढांचागत विकास में संपर्क बढ़ाने का प्रस्ताव करते हैं। भारत आपके राष्ट्रों के विकास संबंधी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये आपके प्रयासों में भागीदार बनने के लिये प्रतिबद्ध है। इस दिशा में भारत ने पिछले साल प्रशांत द्वीप समूह के प्रत्येक देश को सालाना अनुदान सहायता 125,000 डॉलर से बढ़ाकर 200,000 डॉलर कर दी। हमें आशा है कि इससे उन परियोजनाओं को सहायता मिलेगी, जिन्हें आप प्राथमिकता देते हैं। हमें खुशी है कि भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम, आईसीसीआर छात्रवृत्तियां, विदेश सेवा संस्थान द्वारा आयोजित विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल्स और अन्य ऐसी योजनाएं आपके नागरिकों द्वारा प्राप्त की जा रही हैं। हमें यकीन है कि हमारी जनता के बीच ऐसे आदान प्रदान से उनके संबंधों और परसपर विश्वास में वृद्धि होगी। मेरा मानना है कि हमारे आपसी सहयोग में अभी ऐसी काफी संभावनाएं मौजूद हैं, जिनका अनुमान नहीं लगाया गया है। भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, सौर ऊर्जा, आपदा शमन और प्रबंधन कृषि-विशेषकर नारियल और नारियल के रेशे तथा तेल और प्राकृतिक गैस अन्वेषण में पर्याप्त प्रगति की है। हम स्थानीय तौर पर प्रासांगिक प्रौद्योगिकी पर विशेष बल देते हुए कौशल विकास एवं नवाचार पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। हमारी उत्कट इच्छा है कि हम अपना ज्ञान और विशेषज्ञता आप जैसे मित्र देशों के साथ साझा करें, विशेषकर उनके साथ, जहां स्थायी विकास को बढ़ावा देने के लिये इन्हें अपनाया जा सकता है।

महामहिम, भारत और प्रशांत द्वीप समूह के देश, द्वीप समूहों की एक श्रृंखला है और वे जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों का सामना कर रहे हैं। आपकी तरह हमें भी अपनी प्रगति को प्रोत्साहन देते समय अपनी नाजुक पारिस्थितिकी को बचाए रखने में गंभीर चुनौतियां झेलनी पड़ रही हैं। हमारा मानना है कि उत्कृष्ट पद्धतियों और पर्यावरण के अनुकूल प्रौद्योगिकियों को देशों के बीच साझा करने से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिये जरूरी वित्तपोषण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की दिशा में सहयोग से हम सभी को अपार सहायता मिलेगी। भारत ने कार्बन के मूल्य निर्धारण, वनरोपण को प्रोत्साहन, कम कार्बन और नवीकरणीय प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल में वृद्धि तथा सभी क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता में सुधार जैसे कई घरेलू उपाय किये हैं। पर्यावरण के संरक्षण और बहुमूल्य संसाधनों को बचाए रखने में सहायता-जैसे क्षेत्रों में आपके साथ कार्य करके हमें प्रसन्नता होगी।

प्रशांत द्वीप समूह देश प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न हैं। भारत को उनके खनिज, समुद्रीय एवं हाईड्रोकार्बन संसाधनों का इस्तेमाल करने के लिये उनके साथ काम करके प्रसन्नता होगी। भारत सरकार और निजी क्षेत्र आपसी व्यापार को सशक्त और वैविध्यपूर्ण बनाने और मत्स्य, कृषि, तेल और प्राकृतिक गैस, खनन और जल विलवणीकरण में निवेश को बढ़ावा देने के इच्छुक हैं। यह सभी एफआईपीआईसी देशों के हित में होगा कि वे अपनी पूरकों की पहचान करें ताकि हम अपने प्रयास उन पर केन्द्रित कर सकें।

महामहिम, भारत विस्तारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की अपनी उम्मीदवारी के लिये मिले समर्थन की सराहना करता है। उन्होंने कहा कि इस साल संयुक्त राष्ट्र की 70वीं वर्षगांठ है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और उसके विस्तार पर अगले महीने होने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान चर्चा होगी और इस दौरान ठोस प्रस्ताव पर विचार-विमर्श होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि विचार-विमर्श के लिये एक अंतर-सरकारी प्रारूप पहले से तैयार है, जिसके लिये भारत को उनके समर्थन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हमारे देश वैश्विक गवर्नेन्स की संस्थाओं में सुधार के लिये समान प्रतिबद्धता रखते हैं ताकि वे विकाशील देशों की महत्वाकांक्षाओं को बेहतर ढंग से व्यक्त कर सकें। भारत को विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के आगामी सत्र में लंबे समय से प्रतीक्षित इन सुधारों पर बल देने के लिये मिलकर काम करना महत्वपूर्ण होगा।

मुझे विश्वास है कि कल का विचार-विमर्श और मंच के कार्य आने वाले वर्षों में हमारे सहयोग में वृद्धि संबंधी ठोस प्रस्तावों के रूप में परिणत होंगे। मैं हमारी सरकारों और जनता के बीच साझा महत्व वाले क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर आदान प्रदान बढ़ने की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

मैं अपनी तरफ से कहना चाहता हूं कि मुझे इस बात की खुशी है कि आपमें से कुछ लोग अपने जीवनसाथी के साथ पधारे हैं। मुझे आशा है कि आपको यह यात्रा आनन्द प्रदान करेगी और इस मंच के कार्यक्रम आपको नियमित रूप से भारत लाते रहेंगे।

इन्हीं कुछ शब्दों के साथ, महामहिम, मैं एक बार फिर से आपका स्वागत करता हूं और दूसरे एफआईपीआईसी शिखर सम्मेलन की सफलता के लिये शुभकामनाएं देता हूं।