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देश के विकास में शिक्षा का प्रमुख योगदान : प्रो.अशोक कुमार

देश के विकास में शिक्षा का प्रमुख योगदान : प्रो.अशोक कुमार

शिक्षा में संसाधनों के आभाव में शैक्षिक संस्थाओ पर बोझ पड़ने लगा है, इसी मुद्दे पर दीनदयाल उपाध्याय  गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने देश प्रदेश के सम्पादक पीयूष कुमार राय से बातचीत की

प्रो. अशोक कुमार ने बताया  कि उत्तर प्रदेश सरकार ने ये साल , उच्च शिक्षा गुणवत्ता वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की है। प्रो. अशोक कुमार ने कहा कि हम केवल  घोषणा, नारे या औपचारिक आयोजन के बजाय एक ईमानदार कोशिश करें जिसमें शिक्षा में  व्याप्त समस्याओं की पहचान और उनका समाधान हो।
देश के  विकास में शिक्षा का प्रमुख  योगदान होता है । यह एक  स्थापित सत्य है कि बेहतर शिक्षा की ढांचा बेहतर शिक्षकों के जरिये ही खड़ी की जा सकती है। बेहतर शिक्षक प्रतिकूलतम परिस्थितियों में भी किसी की जिंदगी में ज्ञान, संस्कार, मूल्य और प्रतिबद्धता पैदा कर सकता है, इसे पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब की आत्मकथा सहित अनेक प्रसंगों और वक्तव्यों से समझा जा सकता है।
_DSC0717कहा जाता है कि शिक्षक तो जन्मजात होता है, मगर यह भी सच है कि देश-काल-परिस्थितियों के दृष्टिगत उन्हें शिक्षक-प्रशिक्षण देने की जरूरत भी पड़ती है, ताकि वे शिक्षण कला को और अधिक समृद्ध, और परिष्कृत और रुचिकर तथा उपयोगी बना सकें। शायद इसीलिए आजादी  के बाद से लेकर नवीन शिक्षा नीति बनाने वाले सभी आयोगों और समितियों ने शिक्षक-प्रशिक्षण के लिए अलग से अपनी संस्तुतियां दीं और उन्हें यथासंभव लागू भी कराया गया। 1973 में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (एनसीटीई) का गठन हुआ जो 1993 में एक्ट के रूप में अभिहीत हुआ। आज देश भर में शिक्षण-प्रशिक्षण का ढांचा और नीतियां यही संस्था निर्धारित करती हैं।
शिक्षा गुणवत्ता की दशा-दिशा का आकलन करने से पहले कुछ तथ्यों पर गौर करना उचित होगा। पिछले कुछ वर्षों में बीएड की डिग्री लेने  वालों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई और वहीँ दूसरी तरफ प्राथमिक शिक्षा में बड़ी संख्या में अध्यापकों की भर्ती ने इसे सर्वाधिक मांग वाली  उपाधि में बदल दिया। नतीजतन पूरे भारत में हर कहीं खासकर स्ववित्तपोषित (सेल्फ फाइनेंसेड यानि जिन्हें सरकार से अनुदान नहीं मिलता और जो अपना खर्च खुद के संसाधनों से वहन करते हैं) कॉलेजों में बी.एड. की खुलने लगे ।
इन कॉलेजों में से अधिकांश में फीस वृद्धि और नियम विरुद्ध अतिरिक्त शुल्क लेने के आरोप लगने लगे, , कॉलेज खुलते गए और इन सबके बीच धीरे-धीरे शिक्षा की गुणवत्ता का हाशिये पर चली गयी । सिर्फ एक उदाहरण से बात कही जा सकती है- वर्ष 2013 में बीएड कक्षा में प्रवेश का अवसर उस अभ्यर्थी को भी मिला जिसने राज्यस्तरीय प्रवेश परीक्षा में -116 (माइनस 116) अंक प्राप्त किये थे। समझा जा सकता है कि बेहतर शिक्षक तैयार करने की हमारी प्रक्रिया की नींव कितनी कमजोर और कच्ची है और हम अपनी पीढिय़ों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी जिन कन्धों पर डाल रहे हैं, वे खुद कितने मजबूत हैं?2
आज आलम ये है कि बड़ी संख्या में बीएड उपाधिधारक भी बेरोजगार घूम रहे हैं,अभ्यर्थियों की स्ववित्तपोषित कॉलेजों में जाने के प्रति अरुचि के चलते काउंसिलिंग प्रक्रिया में सीटें नहीं भर रहीं मगर बीएड की सीटों में साल-दर-साल वृद्धि का क्रम जारी है।  ऐसा क्यों है? और इसके नतीजे भविष्य में क्या होंगे?ये राज्य और केंद्र दोनों सरकारों के लिए गहन चिंता का विषय है।
समस्या सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, शिक्षक बनाने की इस प्रक्रिया में रफ्तार इतनी तेज है कि नियम-कानून हाशिये पर जा ठिठके हैं। एनसीटीई खुद कई जगहों पर अपने फैसलों के चलते अपनी स्थापना के संकल्पों के आगे अवरोध बनकर खड़ी हो गई है। विश्वविद्यालयों या डिग्री कॉलेजों में अध्यापक होने की अर्हता विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तय करता है और उसके मुताबिक अभ्यर्थी को संबंधित विषय में नेट या स्लेट या कुछ विशेष शर्तों के साथ पीएचडी उपाधि प्राप्त होना ही चाहिए। मगर एनसीटीई ने कई मामलों में मात्र पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री को ही अर्हता बना दी है। एनसीटीई और यूजीसी के बीच नियमों का ये टकराव तब भयंकर हो जाता है, जब किसी विश्वविद्यालय को चयन प्रक्रिया आयोजित करनी होती है।
एनसीटीई ने अर्हता में पहले भी कई बदलाव किये हैं। कभी बीएड अर्हता की शर्त थी, तो कभी एमएड अर्हता शर्त हो गई। हाल ही में संस्था ने अपना नया रेगुलेशन जारी किया है, मगर उसमें भी कई सवाल खड़े करते हैं। इस विनियमन में चयन में आरक्षण नीति को लेकर भी स्पष्टता का अभाव है।
कुछ साल पहले वर्ष भर चलती रहने वाली प्रवेश प्रक्रिया और उसमें अनियमितताओं तथा उसके चलते समय से पूरी पढ़ाई न हो पाने की खबरों का संज्ञान लेते हुए स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने बीएड परीक्षा के आवेदन से लेकर प्रवेश तक और शिक्षण कार्य आरम्भ होने से परिणाम घोषणा तक की तिथियों का कैलेण्डर घोषित किया था। इसका लाभ भी हुआ। इसके साथ ही अदालत ने पढ़ाई के लिए जरूरी आधारभूत ढांचे और उपयुक्त संख्या में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने को लेकर स्पष्ट निर्देश भी जारी किये। मकसद साफ था- जब सत्र शुरू हो तो पर्याप्त संख्या में अध्यापक रहें और जरूरी आधारभूत सुविधाएं भी उपलब्ध हों।
पर दुर्भाग्य से सर्वोच्च अदालत का फैसला एनसीटीई की व्यवस्था से पराजित हो गया, क्योंकि एनसीटीई ने 2014 के अपने रेगुलेशन के जरिये कॉलेजों को उपरोक्त सुविधाओं और शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 30 अक्टूबर तक की छूट दे दी है। ऐसे में सवाल है कि अगर सर्वोच्च अदालत के निर्देशानुरूप 1 जुलाई से सत्र शुरू होता है और कोई कॉलेज अक्टूबर तक शिक्षक और संसाधन जुटा पाता है, तो इन 100-120 दिनों में विद्यार्थी को होने वाले नुकसान का जिम्मेदार कौन है और इस तरीके से गुणवत्ता की गाड़ी कैसे चल पायेगी।
एक समस्या और भी है, सरकारी अनुदान पाने वाले तमाम कॉलेज आज अध्यापकों की कमी से जूझ रहे हैं। शिक्षकों के पद रिक्त हैं।  एनसीटीई की शर्तों के मुताबिक वहां वांछित संख्या में पद चाहिए, मगर रिक्त पदों पर भर्ती वर्षों से स्थगित है। यह कब तक स्थगित रहेगी, कोई नहीं जानता। सरकार भरोसा जरूर दिला रही है मगर अदालती लड़ाइयों में उलझी भर्ती प्रक्रिया को लेकर तारीखें बता पाना किसी के लिए मुमकिन नहीं। ऐसे में इस बात की क्या गारंटी है कि 30 अक्टूबर तक भी शिक्षकों की उपलब्धता हो जाएगी या नहीं।
स्ववित्तपोषित कॉलेजों में अध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया में जटिलता नहीं है, पर वहां दूसरी मुश्किल है। कम संख्या में अर्ह शिक्षकों की उपलब्धता के चलते एक ही अध्यापक का नाम अनेक कॉलेजों में बतौर अध्यापक दर्ज है। हाल में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय द्वारा कराई जांच के नतीजे हैरान करने वाले हैं, जहां कुछ मामलों में एक ही शिक्षक का नाम 9 कॉलेजों में दर्ज है। यह एक विडंबनात्मक सच है कि चूंकि कुछ बेहतर अपवादों को छोड़कर ऐसे कॉलेजों में कक्षाएं नियमित रूप से चलती ही नहीं, इसलिए इस प्रकार की अनियमितताओं की शिकायतें मिलती रहती हैं।
सवालों और चिंताओं की ये सूची बहुत लम्बी है। यहां सभी प्रश्नों पर चर्चा उचित भी नहीं और संभव भी नहीं है, मगर इन सवालों को परिसरों की चारदीवारी और फाइलों की कैद से बाहर लाकर जनविमर्श का विषय बनाना भी बेहद जरूरी है, ताकि अपनी आने वाली पीढिय़ों के प्रति हमसे जाने-अनजाने हो रही गलतियों का निराकरण हो सके।

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