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सरकारें राजभाषा और राष्ट्रभाषा पर सिर्फ राजनीति कर सकती है हिन्दी को समृद नही कर सकती – डॉ ओमप्रकाश सिंह

सरकारें राजभाषा और राष्ट्रभाषा पर सिर्फ राजनीति कर सकती है हिन्दी को समृद नही कर सकती – डॉ ओमप्रकाश सिंह

नई दिल्ली: भारत एक बहुभाषी देश है। हिन्दी के विकास को लेकर चिंता सिर्फ सरकार का काम नही है। सरकारें राजभाषा और राष्ट्रभाषा पर सिर्फ राजनीति कर सकती है हिन्दी को समृद नही कर सकती।  आज से बीस वर्ष पूर्व जब रामायण और महाभारत जैसे टी.वी. सिरियल आ रहे थे तो वह दक्षिण में भी देखा जा रहा था। हमें हिन्दी को वैश्विक रूप में स्वीकारना होगा। आखिर हैदराबाद बाजार के जरिए ही हिन्दी वहां पंहुची। उक्त बातें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ ओपी सिंह ने विगत 23 सितंबर को गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में कही। मौका था “स्वतंत्र भारत में राष्ट्रभाषा का सवाल” विषय पर पुस्तक लोकार्पण सह राष्ट्रीय संगोष्ठी का।
सन 1942 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर ज़िले के मुहम्मदाबाद तहसील पर शहीद हुये 8 अमर सेनानियों की स्मृति में यह कार्यकम हर साल गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में आयोजित किया जाता है। अमर शहीद डॉ शिवपूजन राय प्रतिष्ठान के बैनर तले संम्पन हुई इस संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ ओपी सिंह कर रहे थे। कार्यक्रम में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रम्हदेव प्रसाद कर्जी की संपादित पुस्तक राष्टभाषा का सवाल का लोकर्पण भी हुआ। विषय प्रवेश प्रो ब्रम्हदेव प्रसाद ने किया। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रो कमलानंद झा ने हिन्दी के साथ साथ अन्य भारतीय भाषाओ के विकास को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि हमे भारत की तमाम भारतीय भाषाओं से शब्द लेकर इसे समृद्ध करना होगा।
वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार ने फोर्टविलियम की स्थापना से लेकर अब तक के हिन्दी के विकास का रोचक वर्णन करते हुए रोमन लिपि का पुरजोर विरोध किया। कुमार ने कहा कि हमारे शहीदों की सहादत राष्टभाषा के सवाल से बाहर नही है। हिन्दी की विकास यात्रा के बखान के क्रम में जब अवधेश कुमार ने दक्षिण भारत मे प्रवेश किया तो मंचासीन दूसरे वक्ता और श्रोताओं ने थोड़ा हस्तक्षेप करना चाहा फिर अवधेश जी टी.वी डिबेट वाले अंदाज में नज़र आये।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिल राय ने अपनी बात रखते हुए विदेशों में हिन्दी की जैसी पहचान है उस को व्यक्त किया। अपनी चीन यात्रा का वर्णन करते हुए प्रो राय ने कहा कि विदेशी लोग हिन्दी इसलिये सिखते है ताकि वे हिन्दुस्तान को समझ सके। शहीद पुत्र दीनानाथ शास्त्री और वरिष्ठ अधिवक्ता धर्मराज राय के 1942 के रोचक संस्मरणों से सभागार रोमांचित हो। गया।
कार्यकम में दो पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। स्वतंत्र भारत में राष्टभाषा का सवाल और दुसरीं पुस्तक शहीद राजनारायण राय उर्फ राजा राय के वंशज अनिल राय द्वरा लिखित “Wellness Acclimatization” का भी लोकार्पण किया गया।
 में स्वागत भाषण देते हुए डॉ गोपालजी राय ने गाज़ीपुर की शहादत पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन जेएनयू के शोधार्थी सूर्यभान राय व धन्यवाद ज्ञापन राजीवरंजन राय ने किया। डॉ अमर शहीद डॉ शिवपूजन राय प्रतिष्ठान के सहयोगी रविकुमार झा, विपुल कुमार,गुंजन वत्स, आशुतोष राय सहित जेएनयू डीयू और जामिया विश्वविद्यालय के  सैकड़ों छात्र बारिस के बावजूद भी  सभागर में उपस्थित थे।