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रुस्तम-ए-हिन्द : हिन्द केसरी मंगला राय जन्म शताब्दी

रुस्तम-ए-हिन्द : हिन्द केसरी मंगला राय जन्म शताब्दी

एक छोटे से गांव के साधारण किसान परिवार में जन्म लेने के बावजूद स्व. मंगला राय जी ने न सिर्फ अपने मुल्क में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा और कुश्ती-कला से राष्ट्र को गौरवान्वित किया। उत्तर प्रदेश की इस अद्भुत शख्सियत का जन्म गाजीपुर जनपद के गांव जोगा मुसाहिब में सन् 1916 में हुआ था। उनके पिता रामचंद्र राय और उनके छोटे भाई राधा राय अपने जमाने के मशहूर पहलवान थे। रामचंद्र राय और राधा राय दोनों अपने जवानी के दिनों में जीविकोपार्जन के चलते बर्मा (म्यामार) के रंगून में रहते थे। दोनों भाइयों में राधा राय ज्यादा कुशल पहलवान थे और उन्होंने ही अपने भतीजे मंगला राय को कुश्ती की पहली तालीम दी और दांव-पेंच के गुर सिखाए।

मंगला राय जी को शुरुआती प्रसिद्धि तभी मिल गई थी जब वो रंगून से अपने वतन वापस लौट कर आए थे। वापस आते ही उन्होंने उत्तर भारत के मशहूर पहलवान मुस्तफा हुसैन को अखाड़े में ललकारा। इलाहाबाद में हुई इस कुश्ती में मुस्तफा ने इस नौजवान को शुरु में हल्के में लिया लेकिन इस नौजवान ने जब मुस्तफा के खतरनाक दांव को काटकर अपना प्रिय दांव ‘टांग’ और ‘बहराली’ का प्रहार किया तो महाबली मुस्तफा भहराकर चारो खाने चित हो गया। दर्शकों को सांप सूंघ गया। किसी को अपनी आंखो पर यकीन ही नहीं हो रहा था। लेकिन मंगला राय ने तो संयुक्त प्रांत में कुश्ती का इतिहास पलट दिया था। भारतीय कुश्ती में एक नए सितारे ने रोशनी बिखेर दी थी। मंगला राय की प्रसिद्धि जंगल की आग की तरह फैल गई। नतीजा ये हुआ कि बत्तीस साल के मंगला राय को साल भर के भीतर लगातार सौ कुश्तियां लड़नी पड़ीं।

बीसवीं सदी के चालीस और पचास के दशक में भारत का ऐसा कोई पहलवान नहीं था जिसे मंगला राय के हाथों शिकस्त न खानी पड़ी हो। फिर भी ये दु:खद संयोग है कि जिस नाम और यश के मंगला राय हकदार थे वो उनको मरणोपरांत नहीं मिला। ग्रामीण परिवेश में रहने की वजह से उन्हें वो प्रमोशन नहीं मिल पाया जो उनसे बहुत कम प्रतिभाशाली लोगों को मिला। पंजाब के मशहूर पहलवानों में शुमार केसर सिंह, खडग सिंह और टाइगर जोगिंदर सिंह को अपने जीवन काल में किसी मुकाबले में हार का सामना नहीं करना पड़ा फिर भी मंगला राय ने इन सभी पहलवानों को मुकाबले के दस मिनट के अंदर ही धूल चटा दी। रोमानिया का पहलवान जॉर्ज कांस्टैन्टाइन (टाइगर ऑफ यूरोप के नाम से मशहूर) जब पूरे यूरोप और एशिया के पहलवानों को पछाड़ता हुआ कलकत्ता (कोलकाता) आया तो कोई भी हिंदुस्तानी पहलवान उसके मुकाबले में उतरने को तैयार नहीं था। उस वक्त मंगला राय ने आगे बढ़कर न सिर्फ जॉर्ज की चुनौती को स्वीकार किया बल्कि बीस मिनट तक चले मुकाबले में उसे पटखनी दे दी।

अपने गुरु मंगला राय की तरह उनके शागिर्दों ने भी कुश्ती के क्षेत्र में काफी शोहरत हासिल की। उनके शिष्य दुखहरन झा (दरभंगा) ने कलकत्ता में हुए एक मुकाबले में मशहूर दारा सिंह को पांच मिनट के अंदर ही अखाड़े में धराशायी कर दिया तो वहीं उनके एक और शिष्य सुखदेव (आजमगढ़) की चुनौती स्वीकार करने का साहस बहुत कम पहलवान कर पाते थे।

Mangla Rai

मंगला राय जी प्रतिदिन जो अभ्यास करते थे उसके बारे में सुनकर ही कई पहलवानों का कलेजा कांप जाता था। मंगला राज रोजाना चार हजार बैठकें और ढाई हजार दंड लगाते थे। इसके बाद वो 25 धुरंधरों से लगातार तीन बार कुश्ती लड़ते थे। इतना सुनकर भला कौन पहलवान उनसे जल्दी हाथ मिलाने का साहस कर पाता। 131 किलो वजन और 6 फीट 3 इंच की भीमकाय कदकाठी के बावजूद मंगला राय पूरे सात्विक और शाकाहारी व्यक्ति थे।

मंगला राय का मानना था कि गुरु तो कोई भी बन सकता है लेकिन सच्चा गुरु वही है जो अपने शिष्यों को शिक्षा के साथ उनकी देखभाल भी वैसे ही करे जैसे वो अपनी संतान का करता है। और इस मायने में राय साहब एक आदर्श गुरु थे। रूस्तम ए हिन्द स्व मंगला राय के जन्म शताब्दी पर उनके पैतृक गांव जोगा मुसाहिब जनपद गाजीपुर में 11 से 13 नवम्बर तक राष्ट्रीय स्तर का कुश्ती का आयोजन किया जा रहा है।